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समाधान शास्त्रार्थ से होना चाहिए न कि शस्त्रार्थ से समीर खान, नरसिंहपुर

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संदीप मेहरा 8871972050

मध्यप्रदेश भोपाल विशेष संवाददाता राजकुमार दुबे नरसिंहपुर

📓हमारे भारत में शास्त्रार्थ की एक महान परंपरा रही है, जहाँ विद्वान एक-दूसरे के विचारों को काटते थे, लेकिन व्यक्तित्व का सम्मान कभी कम नहीं होता था। परंतु, हाल ही में ज्योतिषपीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती जी महाराज और उनके शिष्यों के साथ जो कुछ हुआ, उसने इस गौरवशाली परंपरा पर एक गहरा घाव किया है। पिछले कुछ दिनों में जो तस्वीरें और खबरें सामने आईं, उन्होंने दिल को झकझोर कर रख दिया है। एक तरफ भारत की महान आध्यात्मिक परंपरा है, और दूसरी तरफ उस परंपरा के ध्वजवाहक के साथ किया गया अशोभनीय व्यवहार। एक नागरिक होने के नाते, हमारा मानना है कि किसी भी समाज की तहजीब इस बात से आंकी जाती है कि वह अपने बुजुर्गों और धर्मगुरुओं का कितना सम्मान करता है। सबसे पहले, हम उन घटनाओं की कड़े शब्दों में निंदा करते हैं जहाँ शंकराचार्य जी के साथ अभद्रता की गई और उनके साथ मौजूद बटुकों के साथ मारपीट की गई। हमारा मजहब सिखाता है कि “वह हममें से नहीं, जो हमारे बड़ों का सम्मान नहीं करता।” ज्ञान प्राप्त करने वाले कम उम्र के बटुकों पर हाथ उठाना न केवल कानूनन अपराध है, बल्कि यह उस ‘गुरु-शिष्य’ परंपरा का अपमान है जिसके लिए भारत दुनिया भर में जाना जाता है। वैचारिक मतभेद अपनी जगह हो सकते हैं, लेकिन शारीरिक हिंसा और अपशब्दों का सहारा लेना यह दर्शाता है कि हमारे पास तर्कों की कमी है। आज इस बात पर विवाद खड़ा किया जा रहा है कि वे ‘शंकराचार्य’ हैं या नहीं। एक बाहरी व्यक्ति के तौर पर भी, जब मैं इस मामले को गहराई से देखता हूँ, तो कुछ बातें साफ नजर आती हैं। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद जी हमेशा कहते हैं कि पद किसी की पसंद या नापसंद से नहीं, बल्कि शास्त्रों की विधि से तय होना चाहिए। मुस्लिम धर्म में भी ‘खिलाफत’ या ‘इमामत’ के अपने कड़े नियम हैं। यदि स्वामी जी नियमों की बात कर रहे हैं, तो उनकी आवाज को दबाने के बजाय दलीलों से जवाब दिया जाना चाहिए लेकिन ऐसा लगता है कि विवाद उनके ‘पद’ को लेकर उतना नहीं है, जितना उनकी ‘बेबाकी’ को लेकर है। जब कोई धर्मगुरु सत्ता की आंखों में आंखें डालकर सच बोलता है, तो अक्सर उसकी साख पर हमला किया जाता है। उनके पद पर सवाल उठाना दरअसल उनकी आवाज को कमजोर करने की एक कोशिश नजर आती है। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद जी जिस दृढ़ता से मठों की गरिमा की बात कर रहे हैं, वह किसी व्यक्ति की लड़ाई नहीं, बल्कि एक संस्था की स्वायत्तता को बचाने की कोशिश है। विद्वानों के बीच ‘पद’ को लेकर शास्त्रार्थ होना एक पुरानी परंपरा है और वह स्वस्थ लोकतंत्र की निशानी है। लेकिन इस विवाद की आड़ में उनके साथ बदसलूकी करना या उनके शिष्यों को निशाना बनाना किसी भी धर्म की नजर में जायज नहीं है। मैं एक नागरिक होने के तौर पर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद जी के साथ खड़ा हूँ, क्योंकि वे उस ‘हक’ की नुमाइंदगी कर रहे हैं जिसे ताकत के बल पर कुचलने की कोशिश की जा रही है। पद का फैसला विद्वान करेंगे, लेकिन एक इंसान और एक आध्यात्मिक व्यक्तित्व के तौर पर उनका सम्मान करना हम सबका फर्ज है क्योंकि सच्चाई को तर्कों से जीता जा सकता है, लाठियों से नहीं। हमारा धर्म सिखाता है कि जिस समाज में विद्वानों और बुजुर्गों की गरिमा सुरक्षित न हो, वह समाज पतन की ओर अग्रसर होता है। स्वामी जी के काफिले के साथ की गई अभद्रता और निहत्थे बटुकों के साथ मारपीट केवल एक कानून-व्यवस्था का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह एक नैतिक दिवालियापन है। ज्ञान अर्जित करने वाले शिष्यों पर हाथ उठाना यह साबित करता है कि हमलावर न तो धर्म को समझते हैं और न ही मानवता को। हिंसा हमेशा उस पक्ष की कमजोरी को दर्शाती है जिसके पास सत्य की शक्ति नहीं होती। बटुकों के साथ हिंसा की बात को दरकिनार करते हुए कोई कानूनी कार्रवाई न किया जाने के बजाय आज इस बात पर बहस तेज है कि स्वामी जी ‘शंकराचार्य’ हैं या नहीं तो स्वामी जी स्वयं यह मांग कर रहे हैं कि उनकी स्थिति का निर्णय राजनीति से नहीं, बल्कि शास्त्रों और परंपराओं के आधार पर हो। यदि विवाद केवल ‘पद’ का होता, तो यह सभ्य संवाद और कानूनी दस्तावेजों के जरिए लड़ा जाता। लेकिन जब विद्वान के साथ बदसलूकी की जाती है, तो संदेह होता है कि असली समस्या उनका ‘पद’ नहीं, बल्कि उनकी ‘बेबाक आवाज’ है। इतिहास गवाह है कि सत्ता और भीड़ हमेशा उन लोगों से डरी है जो सिद्धांतों के लिए अकेले खड़े होने का दम रखते हैं। पद का फैसला समय और परंपराएं कर देंगी, लेकिन जनता की अदालत में स्वामी जी ने अपनी निर्भीकता से एक ऊंचा मुकाम हासिल कर लिया है। मैं उनके धैर्य और सिद्धांतों के प्रति उनकी निष्ठा का सम्मान करता हूँ। सत्य को लाठियों के जोर पर नहीं बदला जा सकता। वे उस सच को बोलने का साहस दिखा रहे हैं जिसे आज के दौर में बोलना कठिन बना दिया गया है। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद जी के प्रति मेरा समर्थन किसी धार्मिक झुकाव के कारण नहीं, बल्कि ‘हक’ के प्रति मेरी प्रतिबद्धता के कारण है। एक ऐसे समय में जब कई लोग मौन रहना बेहतर समझते हैं, एक सन्यासी का अडिग खड़े रहना सुकून देता है। विवाद चाहे पद का हो या पद्धति का, लेकिन एक आध्यात्मिक गुरु की सुरक्षा और उनके शिष्यों की मर्यादा के साथ समझौता करना किसी भी भारतीय नागरिक को स्वीकार नहीं होना चाहिए। देश के संविधान में सभी धर्मों के प्रति समानता का सन्देश निहित है, ऐसे में मेले में नियुक्त अधिकारियों द्वारा व्यवस्था के नाम पर आप शंकराचार्य होने का सबूत दीजिये… कहना, यह बेतुका और गैर जिम्मेदारी भरा काम है। मेरी बात से बहुत लोग असहमत हो सकते हैं जो असहमत हैं, उनसे मात्र इतनी गुजारिश है कि वह स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद जी से किसी योग्य धर्मगुरु का शास्त्रार्थ करा दें, अगर यह नहीं कर सकते तो शंकराचार्य जी का अपमान और बटुकों पर जो- जोर आजमाइश की गई उसका न्याय दिला दें। सरकार हो या कोई दल या अफसरान या कोई भी व्यक्ति सबको यह बात समझनी होगी और इसके लिए माफी भी मांगी जानी चाहिए, ताकि जो लोग धर्मगुरु का अपमान करने में एकजुट हैं, उन्हें दिखाया जा सके कि हमें अपने धर्म गुरुओं का सम्मान करना नितांत आवश्यक है और हमारे संस्कार भी यही कहते हैं।

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